Sawa Ser Gehun | सवा सेर गेहूँ | Munshi Premchand | Paper Back Hindi

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    Publisher : Radha pocket house

    हिंदी कहानी सवा सेर गेहूँ, मुंशी प्रेमचंद की कहानी सवा सेर गेहूं
    किसी गाँव में शंकर नामी एक किसान रहता था। सीधा-सादा ग़रीब आदमी था। अपने काम से काम, न किसी के लेने में, न किसी के देने में, छक्का-पंजा न जानता था। छल-कपट की उसे छूत भी न लगी थी। ठगे जाने की फ़िक्र न थी। विद्या न जानता था। खाना मिला तो खा लिया न मिला तो चरबन पर क़नाअत की। चरबन भी न मिला तो पानी लिया और रामा का नाम लेकर सो रहा। मगर जब कोई मेहमान दरवाज़े पर आ जाता तो उसे ये इसत्ग़िना का रास्ता तर्क कर देना पड़ता था। ख़ुसूसन जब कोई साधू महात्मा आ जाते थे तो उसे लाज़िमन दुनियावी बातों का सहारा लेना पड़ता। ख़ुद भूका सो सकता था मगर साधू को कैसे भूका सुलाता। भगवान के भगत जो ठहरे।